कोर्ट में अध्यादेश 5 मिनट भी नहीं टिकेगा; BJP का दावा- अधिकारियों को बंधक बनाया गया | Arvind Kejriwal VK Saxena | Center Ordinance On Transfer-Posting Rights In Delhi


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नई दिल्ली4 घंटे पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को आदेश दिया था कि अफसरों के ट्रांसफर और पोस्टिंग की पावर दिल्ली सरकार के पास रहेगी। केंद्र ने अध्यादेश के जरिए कोर्ट का फैसला पलट दिया है। ( फाइल फोट )

राजधानी में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार शुक्रवार की देर रात अध्यादेश ले आई। इस पर शनिवार को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रेस वार्ता की। सीएम ने कहा कि एनसीसीएसए अध्यादेश लाकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को चुनौती दी है।

एनसीसीएसए का यह मामला कोर्ट में पांच मिनट भी नहीं टिकेगा। हम इसे सुप्रीम कोर्ट में इस अध्यादेश को चुनौती देगें। केजरीवाल ने केंद्र ने पहले ही सोच लिया था कि अध्यादेश लाकर हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलट देंगे। केंद्र की यह सोची-समझी साजिश है।

उधर, भाजपा ने दावा किया है कि दिल्ली सरकार अधिकारियों को बंधक बनाकर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रही है।

अध्यादेश के लिए केंद्र कोर्ट के बंद होने का इंतजार कर रहा था: केजरीवाल
सीएम ने कहा कि इस अध्यादेश की टाइमिंग भी केंद्र के प्लान के तहत थी। उन्हें भी पता था कि हम इस अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। इसलिए देर रात ये काला अध्यादेश लागू किया गया। केंद्र सरकार और उपराज्यपाल कोर्ट के बंद होने का इंतजार कर रहे थे। ये पहले अध्यादेश क्यों नहीं लाए? ये अध्यादेश पूरी तरह से गैरकानूनी और जनतंत्र के खिलाफ है।

AAP और भाजपा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर किए वार-पलटवार

ये अध्यादेश लोकतंत्र की हत्या है: संजय सिंह
AAP सांसद संजय सिंह और केबिनेट मंत्री आतिशी ने प्रेस वार्ता कर केंद्र के द्वारा लाए गए अध्यादेश को लोकतंत्र की हत्या बताया है। आप नेताओं ने एक स्वर में कहा है कि दिल्ली सरकार जल्द ही केंद्र के अध्यादेश को फिर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। भाजपा तानाशाही से सरकार चलाना चाहती है।

अधिकारियों को धमकाया, बंधक बनाया गया: सचदेवा
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा, नेता विपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी और सांसद मनोज तिवारी ने शनिवार को पत्रकार वार्ता कर कहा कि दिल्ली में अधिकारियो के तबादलों और तैनाती पर अध्यादेश का स्वागत किया। नेताओं ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ में अधिकारियों को डरा-धमका रही है। अधिकारियों को बंधक बनाकर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रही है।

BJP नेताओं ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ में अधिकारियों को डरा-धमका रही है।

दिल्ली सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन लगाए केंद्र: कांग्रेस
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल चौधरी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट से अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार मिलते ही आम आदमी पार्टी के मंत्री अराजक हाे गए हैं। दिल्ली सचिवालय में सतर्कता अधिकारी के कमरे का ताला तोड़ा गया। गुंडो के तरह मंत्री ने अधिकारी को बंधक बनाया, उसे धमकी दी। केंद्र सरकार को तुरंत केजरीवाल सरकार को बर्खास्त कर दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहिए।

सिलसिलेवार पढ़ें कब क्या हुआ…

11 मई: सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा- दिल्ली सरकार की सलाह पर काम करेंगे LG
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को फैसला दिया कि दिल्ली में सरकारी अफसरों पर चुनी हुई सरकार का ही कंट्रोल रहेगा। 5 जजों की संविधान पीठ ने एक राय से कहा- पब्लिक ऑर्डर, पुलिस और जमीन को छोड़कर उप-राज्यपाल बाकी सभी मामलों में दिल्ली सरकार की सलाह और सहयोग से ही काम करेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

12 मई: केजरीवाल सरकार ने सर्विस सेक्रेटरी का ट्रांसफर किया, LG ने रोका
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के फैसले के एक दिन बाद ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सर्विस सेक्रेटरी आशीष मोरे को हटा दिया। दिल्ली सरकार का आरोप है कि LG ने इस फैसले पर रोक लगा दी है। LG सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ऐसा कर रहे हैं। यह कोर्ट के आदेश की अवमानना है। हालांकि बाद में LG ने फाइल पास कर दी। पूरी खबर पढ़ें…

19 मई: केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 7 दिन बाद केंद्र सरकार ने 19 मई को दिल्ली सरकार के अधिकारों पर अध्यादेश जारी कर दिया। अध्यादेश के मुताबिक, दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग का आखिरी फैसला उपराज्यपाल यानी LG का होगा। इसमें मुख्यमंत्री का कोई अधिकार नहीं होगा। ​​​​​​संसद में अब 6 महीने के अंदर इससे जुड़ा कानून भी बनाया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…

शुक्रवार को दिन भर दिल्ली सरकार के कई मंत्रियों ने LG ऑफिस जाकर उनसे मिलने के लिए हंगामा किया।

यह पूरा विवाद क्या था…

  • AAP सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों की लड़ाई 2015 में दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची थी। हाईकोर्ट ने अगस्त 2016 में राज्यपाल के पक्ष में फैसला सुनाया था।
  • AAP सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 5 मेंबर वाली संविधान बेंच ने जुलाई 2016 में आप सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि CM ही दिल्ली के एग्जीक्यूटिव हेड हैं। उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता के बिना स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते हैं।
  • इसके बाद सर्विसेज यानी अधिकारियों पर नियंत्रण जैसे कुछ मामलों को सुनवाई के लिए दो सदस्यीय रेगुलर बेंच के सामने भेजा गया। फैसले में दोनों जजों की राय अलग थी।
  • जजों की राय में मतभेद के बाद यह मामला 3 मेंबर वाली बेंच के पास गया। उसने केंद्र की मांग पर पिछले साल जुलाई में इसे संविधान पीठ के पास भेज दिया।
  • संविधान बेंच ने जनवरी में 5 दिन इस मामले पर सुनवाई की और 18 जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
  • 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अफसरों पर कंट्रोल का अधिकार दिल्ली सरकार को दे दिया। साथ ही कहा कि उपराज्यपाल सरकार की सलाह पर ही काम करेंगे।

नेताओं के बयान …

  • केजरीवाल ने विपक्षी पार्टियों से अपील की है कि जब राज्यसभा में अध्यादेश को कानून बनाने के लिए बिल आए तो वे उसे पारित ना होने दें। उन्होंने कहा- जैसे ही सुप्रीम कोर्ट गर्मी की छुट्टियों के लिए बंद हुआ। केंद्र ने अध्यादेश लाकर फैसले को पलट दिया।
  • भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि हमें अध्यादेश लाना पड़ा क्योंकि SC का आदेश आने के कुछ दिनों बाद ही दिल्ली सरकार ताकत दिखाने लगी थी। उन्होंने केजरीवाल के सरकारी बंगले के रिनोवेशन में हुई गड़बड़ियों की जांच करने वाले IAS अफसर को ट्रांसफर कर दिया था।
  • शिक्षा मंत्री आतिशी ने कहा कि अरविंद केजरीवाल को अधिकार मिलने के डर से केंद्र सरकार यह अध्यादेश लेकर लाई है। यह अजीब है कि दिल्ली की जनता ने 90% सीट अरविंद केजरीवाल को दी हैं, लेकिन दिल्ली की सरकार अरविंद केजरीवाल नहीं चला सकते।
  • भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने कहा कि जिस तरह अरविंद केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के प्रशासन को बदनाम कर मनमानी करने का प्रयास किया उसके चलते केन्द्र सरकार जो अध्यादेश लाई है भाजपा उसका स्वागत करती है।

अध्यादेश क्या होता है?
जब संसद या विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा हो तो केंद्र और राज्य सरकार तात्कालिक जरूरतों के आधार पर राष्ट्रपति या राज्यपाल की अनुमति से अध्यादेश जारी करती हैं। इसमें संसद/विधानसभा द्वारा पारित कानून जैसी शक्तियां होती हैं।

अध्यादेश को छह महीने के अंदर संसद या राज्य विधानसभा के अगले सत्र में सदन में पेश करना अनिवार्य होता है। अगर सदन उस विधेयक को पारित कर दे तो यह कानून बन जाता है। जबकि तय समय में सदन से पारित नहीं होने पर यह समाप्त हो जाता है। हालांकि, सरकार एक ही अध्यादेश को बार-बार भी जारी कर सकती है।

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